सत्ता की बाजी: नेताओं की दौड़
मत कहो, आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।
सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।
इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।
पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है
रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।
हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।
दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है ।
दोस्तों, दुष्यंत कुमार जी की यह मेरी प्रिय कविता। आज या सौ साल बाद भी,जब भी किसी मतदाता को सतर्क करना हो यह कविता उतनी ही प्रखर रूप से पढी जाएगी।
जरा सोचिए, यदि आपने किसी मॉल से घड़ी खरीदी है और वह घर लाते ही खराब हो गई और आप दूसरे ही दिन उसे बदलने मॉल जाते हो, पर वहाँ आपको वह दुकान दिखाई ही न दे तो या यूं कहो की दुकान का मालिक ही फरार हुआ तो?
आजकल ऐसा आलम हर जगह देखने को मिलता है। जिसे देखो वह ज़िम्मेदारियों से भागता नजर आता है, मानो जिंदगी कम, दौड़ ज्यादा हो। हर एक इंसान, चाहे वह किसी स्कूल का मास्टर हो, कारोबारी हो या फिर हमारे माननीय नेताजी, सब पार्ट टाइम में दौड़ते ही दिखाई देते हैं।
कल परसों की ही बात है, कॉलोनी में सालों से एक साथ रहने वाले चाचा- भतीजे का जोरो शोरों से ब्रेकअप हो गया। भतीजा मायूस होकर बगल वाले घर में पनाह लेने चला गया और पड़ोसी के साथ आज अपने ही चाचा के खिलाफ बगावत पर उतर आया। नसीब यह बात बस उस घर तक ही सीमित थी, यदि मान लीजिए ऐसा कुछ राजनीति में होता या फिर किसी सियासी दल में तो?
मेरे और आप जैसे उन लाखों मतदाताओं का क्या होता? वैसे, कुछ खास होता भी नहीं , यह सब नया थोड़ी न है। हमें तो इसकी आदत हो चुकी है, जहाँ कुर्सी वहाँ नेताजी। और रही बात आपके सामाजिक समस्याओं की तो फिर वह आपका निजी मसला है, उसे आप ही देख लें। खामखाह भावी मंत्री जी को डिस्टर्ब ना करें।
हम बेझिझक इन्हें चुनते हैं और ये सत्ता के प्यासे बने दौड़ते रहते हैं, आज इस खेमे में तो कल उसमें...। आज ही की बात है, हवा भी चकरा गई इनका अजब गजब बहता रुख देख कर! रवीश कुमार कहते हैं " दिल्ली में 'अँधेरा' रात को ही नहीं आता, दिन में भी घूमता रहता है। अँधेरे का फ़ैसला सत्ता करती है, सूरज नहीं।" सच में राजनिति का स्तर इतना गिर चुका है?...
खैर, मैं तो बस दुष्यंत जी को याद कर रहा था, बात कहाँ से कहाँ तक पहुँच गई पता ही नही चला।
सावधान रहें, सतर्क रहे। जय हिंद।
(मैं कोई Crime Petrol देख कर नहीं आ रहा , बस सोचा आपको सचेत करता चलूँ।)
- एक सजग नागरिक
तेजस शेळके
Image courtesy: The Quint
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